डॉ.किशन टण्डन क्रान्ति के साहित्य में लोक चेतना, हाशिए की आवाज से लोक - जागरण तक पहुंचता साहित्य
84 से अधिक कृतियों में बहुजन चेतना, आदिवासी अस्मिता, सतनाम दर्शन, राष्ट्रीय भावना और आमजन के संघर्षों का सशक्त चित्रण
कोरबा (छत्तीसगढ़ महिमा)। 20 सितंबर 2026,
हिन्दी साहित्य में लोक चेतना का अर्थ केवल लोकगीतों और लोककथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जन-गण-मन की पीड़ा, संघर्ष, आकांक्षा, अस्मिता और अधिकारों की अभिव्यक्ति भी है। छत्तीसगढ़ के मस्तूरी-बिलासपुर अंचल में जन्मे साहित्य वाचस्पति डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति का साहित्य इसी व्यापक लोक चेतना का जीवन्त दस्तावेज दिखाई देता है। उनके साहित्य में समाज के वंचित और हाशिए के वर्गों की आवाज के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की माटी, संस्कृति, प्रकृति, आदिवासी जीवन, सतनाम परंपरा और आमजन के संघर्षों की स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है। डॉ.किशन टण्डन क्रान्ति प्रशासनिक सेवा से जुड़े रहे हैं और छत्तीसगढ़ शासन के महिला एवं बाल विकास विभाग में संयुक्त संचालक के रूप में भी दायित्व निभा चुके हैं। वे 'छत्तीसगढ़ कलमकार मंच' के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। साहित्य के विविध क्षेत्रों में सक्रिय उनके कृतित्व को विभिन्न सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें टैलेंट आइकॉन-2022, भारत भूषण सम्मान 2022 - 23, राष्ट्रीय महात्मा गांधी रत्न अवार्ड - 2023, इंटरनेशनल स्टार अवार्ड - 2025 और इंटरनेशनल आइकॉन अवार्ड-2026 सहित अन्य सम्मान शामिल हैं।
विविध विधाओं में विस्तृत साहित्यिक फलक
डॉ.किशन टण्डन क्रान्ति की अब तक 84 से अधिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके साहित्यिक संसार में कविता, कहानी, लघुकथा, बाल साहित्य, नारी विमर्श, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, उपन्यास, समीक्षा और सतनाम साहित्य जैसी विविध विधाएं शामिल हैं। उनकी अनेक पुस्तकों का प्रकाशन छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा भी कराया गया है। उनके हिन्दी काव्य-संग्रहों में 'पगडण्डी', 'उड़ रहा गांव', 'अमरबेल', 'पत्थर के फूल', 'चक्रवात', 'स्पंदन', 'सतरंगी बस्तर', 'मंथन', 'मुक्तिपथ', 'परख' और 'मसीहा' प्रमुख हैं। छत्तीसगढ़ी कविता-संग्रहों में 'नवा रद्दा', 'भुइयां के भगवान' और 'सोला आना सच' उल्लेखनीय हैं। 'अरपा' कहानी-संग्रह के 12 भाग तथा 'दलहा' लघुकथा-संग्रह के सात भाग उनके व्यापक रचनात्मक सरोकारों को सामने रखते हैं।
बाल साहित्य में 'पंखों वाला घोड़ा', 'रंग-बिरंगी पेंसिलें' और 'बचपन' जैसी कृतियां शामिल हैं। 'पंखों वाला घोड़ा' राष्ट्रीय पुस्तक प्रतियोगिता-2020 में चयनित हुआ था। नारी विमर्श पर 'आधी दुनिया', 'बराबरी का सफर' और 'देवी या दासी?' जैसी कृतियां प्रकाशित हुई हैं। वहीं 'अदा' सेक्स वर्करों के जीवन और 'दुर्दशा' किसान आत्महत्या जैसे गंभीर सामाजिक विषयों को केंद्र में रखती हैं।
बहुजन और वंचित समाज की आवाज
डॉ.क्रान्ति के साहित्य में लोक चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष बहुजन और वंचित समाज की अभिव्यक्ति है। उनकी रचनाओं में पिछड़े, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित समुदायों के जीवन-संघर्ष, सामाजिक असमानता और अधिकारों की आकांक्षा को स्थान मिलता है। उनका साहित्य सामाजिक न्याय, समानता, गरिमा और प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्नों को पाठकों के सामने रखता है।
बस्तर की धरती और आदिवासी अस्मिता
'सतरंगी बस्तर' जैसी कृति में आदिवासी जीवन, प्रकृति और संघर्ष की विविध छवियां उभरती हैं। 'भूमकाल के महानायक' कविता में गुण्डाधुर के माध्यम से आदिवासी प्रतिरोध और गौरव की ऐतिहासिक चेतना को अभिव्यक्ति दी गई है। इस तरह बस्तर उनके साहित्य में केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि संस्कृति, अस्मिता और संघर्ष की जीवंत भूमि बनकर सामने आता है।
सतनाम और बौद्ध दर्शन से सामाजिक समता का संदेश
डॉ. क्रान्ति के साहित्य का एक महत्वपूर्ण आयाम सतनाम परंपरा और बौद्ध दर्शन भी है। 'सत् श्वेत सतनाम', 'सतनाम सार', 'सतनाम प्रकाश', 'सतनाम आंदोलन', 'सतनाम रहस्यवाद', 'सतनाम धर्म और उनके पंथ' तथा 'गुरु घासीदास जी की बानी' जैसी कृतियों में सामाजिक समता, सादगी और मानवीय मूल्यों पर जोर दिखाई देता है। इसी क्रम में 'धम्मचक्कपवत्तन' जैसी रचना में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग को दुःख से मुक्ति और मानवीय जीवन के मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस साहित्य में धार्मिक विमर्श के साथ सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का पक्ष भी उभरता है।
राष्ट्र और स्वतंत्रता की चेतना
'काल - कोठरी' में अंडमान की सेल्युलर जेल और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृतियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति दी गई है। वहीं 'कागज की अभिलाषा' जैसी कविताओं में स्वाभिमान, देशहित और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव दिखाई देता है। उनके साहित्य में लोक चेतना कई स्थानों पर व्यापक राष्ट्रीय चेतना का रूप लेती है।
आम आदमी के जीवन से जुड़ा साहित्य
डॉ.किशन टण्डन क्रान्ति के कहानी, लोककथा और उपन्यास साहित्य में आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन और संघर्ष प्रमुखता से सामने आते हैं। रोटी और रोजगार का संघर्ष, न्याय की तलाश, शिक्षा का महत्व, पारिवारिक रिश्तों में बदलाव तथा सामाजिक समस्याएं उनकी रचनाओं के विषय हैं। खास बात यह है कि उनकी रचनाएं केवल समस्या को रेखांकित नहीं करतीं, बल्कि समाधान और सकारात्मक दिशा की तलाश भी करती हैं।
सहज भाषा, प्रभावी शिल्प
डॉ. क्रान्ति की भाषा आम पाठक से सीधे संवाद करती है। हिन्दी के साथ छत्तीसगढ़ी, अवधी और खड़ी बोली के सहज शब्दों का प्रयोग उनकी रचनाओं को लोकजीवन के करीब ले जाता है। छोटे वाक्य, प्रभावी शब्द-विन्यास, सहज प्रवाह और स्पष्ट संदेश उनके लेखन की विशेषताएं हैं। यही लोकाभिमुख शैली उनके साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग से जोड़ने में सहायक बनती है।
'कलम-दान' के माध्यम से साहित्य को सामाजिक सरोकार
डॉ. क्रान्ति के लिए लेखन केवल साहित्य-सृजन तक सीमित नहीं है। 'कलम-दान' जैसे अभियान के माध्यम से वे शिक्षा, ज्ञान और साक्षरता को सामाजिक सरोकार से जोड़ने का प्रयास करते हैं। इस दृष्टि से उनकी कलम साहित्य के साथ सामाजिक जागरण का माध्यम भी बनती है।
साहित्य को लोक और जीवन से जोड़ने की पहल
डॉ.प्यारेलाल आदिले 'तनय', प्राचार्य एवं पी-एच.डी. शोध निर्देशक (राजनीतिशास्त्र), जे.बी.डी. कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, कटघोरा, जिला कोरबा के अनुसार, डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति का साहित्य 'कला कला के लिए' की अवधारणा से आगे बढ़कर 'कला लोक के लिए' और 'कला जीवन के लिए' की भावना को अभिव्यक्त करता है। उनके अनुसार डॉ. क्रान्ति कलम को केवल लेखन का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान-दान और लोक-जागरण का माध्यम मानते हैं।
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति के साहित्य में लोक चेतना छत्तीसगढ़ की माटी, सतनाम की सादगी, बस्तर की आदिवासी अस्मिता, प्रकृति के सौंदर्य, सामाजिक विषमता और आमजन के संघर्षों से निर्मित दिखाई देती है। यही विविधता उनके साहित्य को लोकजीवन से जोड़ती है और उनकी रचनाओं को सामाजिक सरोकारों के विमर्श का महत्वपूर्ण माध्यम बनाती है।