छत्तीसगढ़ संवाद के अजब-गजब नियम-कायदे, छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन पर उठे सवाल

छत्तीसगढ़ संवाद के अजब-गजब नियम-कायदे, छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन पर उठे सवाल
   नियमों में लगातार बदलाव से प्रकाशकों में नाराजगी,डिजिटल और ऑफसेट प्रिंटिंग के नाम पर विज्ञापन कटौती का आरोप
    रायपुर (छत्तीसगढ़ महिमा)। 31 अगस्त 2026,
  छत्तीसगढ़ शासन का जनसंपर्क विभाग प्रदेश सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं, पोर्टल, वेबसाइट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। इसके लिए शासन की ओर से विज्ञापन जारी किए जाते हैं, जिससे मीडिया संस्थानों को आर्थिक सहयोग भी प्राप्त होता है। लेकिन अब छत्तीसगढ़ संवाद के नियम - कायदों और विज्ञापन वितरण की प्रक्रिया को लेकर छोटे समाचार पत्रों के संचालकों एवं संपादकों में असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। प्रकाशकों का आरोप है कि समय-समय पर ऐसे नए नियम सामने आ रहे हैं, जिनके चलते छोटे और स्थानीय समाचार पत्रों को विज्ञापन प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
पहले आवेदन प्रक्रिया सरल,अब दस्तावेजों का बढ़ता बोझ
प्रकाशकों के अनुसार,पूर्व में छत्तीसगढ़ संवाद छोटापारा, रायपुर से संचालित होने के दौरान विज्ञापन के लिए आयुक्त के नाम आवेदन के साथ समाचार पत्र या पत्रिका की प्रति संलग्न करने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल थी। बाद में नियमों में बदलाव के साथ प्रसार संख्या,सीए प्रमाण पत्र,समाचार पत्र पंजीयन,नियमितता प्रमाण पत्र, नवीनतम अंक सहित कई दस्तावेजों की मांग की जाने लगी। इसके बाद मुद्रणालय एवं प्रिंटिंग प्रेस से संबंधित प्रमाण भी आवश्यक किए जाने लगे। प्रकाशकों का कहना है कि दस्तावेजों की पूर्ति करने के बावजूद आवेदन में छोटी-छोटी कमियां निकालकर विज्ञापन में कटौती अथवा विज्ञापन से वंचित किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
  दस्तावेज पूरे होने के बाद भी विज्ञापन में कटौती का आरोप
   छोटे समाचार पत्र संचालकों का आरोप है कि कई बार निर्धारित दस्तावेजों के साथ आवेदन प्रस्तुत करने के बावजूद उन्हें विज्ञापन के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। वहीं कुछ प्रकाशकों का दावा है कि बार - बार आवेदन और निवेदन के बाद भी विज्ञापन में कटौती कर दी जाती है। प्रकाशकों का कहना है कि यदि नियम सभी के लिए समान हैं तो उनकी पारदर्शी तरीके से जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए और यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किस आधार पर किसी समाचार पत्र को विज्ञापन दिया गया तथा किसी अन्य को कम या बंद किया गया।
भाजपा सरकार के 03 कार्यकाल था सुव्यवस्थित और 04 कार्यकाल में बदली व्यवस्था पर उठे सवाल
प्रकाशकों का एक वर्ग वर्तमान व्यवस्था की तुलना पूर्ववर्ती व्यवस्था से करते हुए सवाल उठा रहा है। उनका कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के लंबे 03 वर्ष कार्यकाल के दौरान छोटे-बड़े समाचार पत्रों को नियमित रूप से विज्ञापन मिलने की व्यवस्था थी।
वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के भाजपा के 04 कार्यकाल में नियमों में हुए बदलावों को लेकर अब छोटे प्रकाशकों में असमंजस की स्थिति है। हालांकि विज्ञापन वितरण के नियमों और वास्तविक प्रक्रिया को लेकर विभाग की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है, ताकि आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्य सामने आ सकें।
‘छत्तीसगढ़िया बनाम परदेशिया’ विज्ञापन वितरण पर भी उठे सवाल
स्थानीय समाचार पत्र संचालकों का कहना है कि छत्तीसगढ़ में प्रकाशित होने वाले स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों को प्रदेश की स्थानीय खबरों और पाठकों तक पहुंच के आधार पर उचित प्राथमिकता मिलनी चाहिए। प्रकाशकों का आरोप है कि स्थानीय छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन कम किए जाने के बावजूद दूसरे राज्यों से संचालित बड़े मीडिया संस्थानों को पर्याप्त विज्ञापन मिलने की स्थिति में सवाल उठना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि यदि ऐसा कोई मापदंड लागू है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। प्रदेश के विभिन्न जिलों में जनसंपर्क अधिकारियों के माध्यम से स्थानीय समाचार पत्रों की जानकारी विभाग तक पहुंचती है। ऐसे में प्रकाशकों का तर्क है कि विभाग के पास स्थानीय मीडिया संस्थानों से संबंधित पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है और उसी के आधार पर पारदर्शी विज्ञापन नीति बनाई जा सकती है।
डिजिटल बनाम ऑफसेट प्रिंटिंग बना नया विवाद
सबसे बड़ा सवाल अब डिजिटल और ऑफसेट प्रिंटिंग को लेकर उठ रहा है। कुछ छोटे समाचार पत्र संचालकों का आरोप है कि डिजिटल प्रिंटिंग से प्रकाशित समाचार पत्रों को विज्ञापन देने में कटौती या अड़चन का सामना करना पड़ रहा है, जबकि ऑफसेट प्रिंटिंग को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रकाशकों का कहना है कि समाचार पत्र का मूल उद्देश्य समाचार और सरकारी योजनाओं की जानकारी पाठकों तक पहुंचाना है। डिजिटल अथवा ऑफसेट प्रिंटिंग की तकनीक को विज्ञापन वितरण में इतना महत्वपूर्ण आधार बनाया जाना उचित है या नहीं, इस पर विभाग को स्पष्ट नीति जारी करनी चाहिए।
‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में डिजिटल प्रिंटिंग पर सवाल क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में डिजिटल इंडिया अभियान के माध्यम से डिजिटल तकनीक को बढ़ावा दिया गया है। सरकारी सेवाओं से लेकर पंचायत और प्रशासनिक कार्यों तक डिजिटल माध्यमों का व्यापक उपयोग हो रहा है। ऐसे दौर में प्रकाशकों का सवाल है कि यदि डिजिटल तकनीक को आधुनिक और किफायती माध्यम के रूप में स्वीकार किया जा रहा है, तो डिजिटल प्रिंटिंग को समाचार पत्रों के विज्ञापन वितरण में प्रतिकूल आधार क्यों बनाया जाए? उनका कहना है कि ऑफसेट और डिजिटल दोनों माध्यमों में समाचार पत्र प्रकाशित करने में आर्थिक लागत, श्रम और संसाधन लगते हैं। इसलिए विज्ञापन नीति का आधार केवल प्रिंटिंग तकनीक के बजाय समाचार पत्र की वैधता, नियमित प्रकाशन, प्रसार, पाठक पहुंच और सरकारी विज्ञापन के प्रभावी प्रचार-प्रसार को बनाया जाना चाहिए।
बड़े मीडिया संस्थानों के लिए अलग और छोटे अखबारों के लिए अलग नियम?
छोटे समाचार पत्र संचालकों का सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि नियम सभी के लिए समान हैं तो उनकी समान रूप से निगरानी और अनुपालना क्यों नहीं दिखाई देती? उनका आरोप है कि कुछ बड़े समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों को लगातार पर्याप्त विज्ञापन मिल रहे हैं, जबकि छोटे प्रकाशकों के लिए नियमों और दस्तावेजों की जटिलता बढ़ती जा रही है। यदि नियमों का समान रूप से पालन किया जाए तो विज्ञापन वितरण में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान हो सकता है।
 विभाग की स्पष्ट नीति से दूर हो सकता है विवाद
छोटे समाचार पत्रों के संचालकों की मांग है कि छत्तीसगढ़ संवाद विज्ञापन वितरण की पूरी प्रक्रिया, पात्रता के मापदंड, प्रिंटिंग माध्यम, प्रसार संख्या, नियमितता तथा विज्ञापन आवंटन की प्राथमिकता को लेकर स्पष्ट और सार्वजनिक नीति जारी करे। साथ ही विज्ञापन में कटौती या आवेदन निरस्त किए जाने की स्थिति में उसका लिखित कारण उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो। इससे छोटे-बड़े सभी समाचार पत्रों के बीच समानता और पारदर्शिता बनी रहेगी। फिलहाल छत्तीसगढ़ संवाद की विज्ञापन नीति और नियम-कायदों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब विभागीय स्तर पर स्पष्ट होना बाकी है। यदि सरकार छोटे और स्थानीय समाचार पत्रों की शिकायतों पर निष्पक्ष समीक्षा कर पारदर्शी व्यवस्था लागू करती है, तो इससे न केवल मीडिया संस्थानों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि शासन की योजनाओं के प्रचार-प्रसार को भी व्यापक मजबूती मिल सकती है।