राष्ट्रीय साझा संकलन में प्रदेश के साहित्यकारों को मिला सृजन का व्यापक मंच, शब्दों के माध्यम से लोकजीवन, संवेदना और सामाजिक सरोकारों को मिली नई पहचान
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ महिमा)। 21 सितंबर 2026, शब्द जब संवेदना से जुड़ते हैं तो साहित्य जन्म लेता है और जब साहित्य समाज की स्मृतियों, संघर्षों, लोकजीवन और सरोकारों को अपनी अभिव्यक्ति देता है, तब वह कालखंड की ‘धरोहर’ बन जाता है। इसी साहित्यिक भावना को साकार करता ‘धरोहर’ राष्ट्रीय साझा संकलन छत्तीसगढ़ की रचनात्मक चेतना को राष्ट्रीय फलक पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर सामने आया है। इस राष्ट्रीय साझा संकलन में छत्तीसगढ़ के 56 कलमकारों की रचनात्मक सहभागिता दर्ज हुई है। प्रदेश के अलग - अलग अंचलों से जुड़े इन रचनाकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से साहित्य की विविध धाराओं को समृद्ध किया है। किसी की कलम में लोकजीवन की सुगंध है, तो किसी के शब्दों में सामाजिक चेतना की आहट, कहीं मानवीय संवेदनाओं की गहराई दिखाई देती है, तो कहीं समय और समाज के बदलते स्वरूप की मुखर अभिव्यक्ति। ‘धरोहर’ में शामिल होना इन रचनाकारों के लिए केवल किसी संकलन का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मक पहचान को साझा राष्ट्रीय मंच पर दर्ज कराने का अवसर भी है। यह सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की धरती केवल लोकसंस्कृति और परंपराओं की दृष्टि से ही समृद्ध नहीं, बल्कि यहां की साहित्यिक चेतना भी निरंतर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है।
ये हैं ‘धरोहर’ के सहभागी कलमकार
राष्ट्रीय साझा संकलन में शामिल रचनाकारों में डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति, कुमारी गरिमा पोयाम,खिली प्रसाद मधुकर, चीनू टण्डन ‘सिकन्दर’, श्रीमती लक्ष्मी डहरिया, सेवक राम निषाद, रामसूरत भारद्वाज, श्रीमती विनीता गेंदले, ऐन प्रसाद घृतलहरे, महेंद्र कुमार खूंटे, डॉ.गोवर्धन मार्शल, बेदराम जाटवर ‘वेदांज’, डॉ. मीरा आर्ची चौहान, मनोज कुमार मनहरे, अशोक कुमार बंजारे, सुश्री नीतेश्वरी सूर्यवंशी, राजेन्द्र गेंदले,राजेश कुमार बंजारे, चैतराम टण्डन ‘अपरिचित’, बुंदराम जांगड़े, डॉ.चन्द्रभान ‘चन्द्र’, सुरजीत क्रान्ति, डॉ.अलका यादव, राजू लावत्रे, मनोज कुमार पटेल, श्रीमती हेमलता पटेल, श्रीमती वसुन्धरा कुर्रे, देव मानिकपुरी, नवीन कुमार कुर्रे, मोहन सत्ऋषु, मनोज डागा, श्रीमती के. संध्या नेताम, मनोज कुमार प्रधान, श्रीमती रीता राय ऋषिता,हजारी लाल कुर्रे, डॉ.प्यारेलाल आदिले ‘तनय’,पुरुषोत्तम कुमार आदिले, मणिशंकर दिवाकर ‘गदगद’, सुरेश कुमार ‘चन्द्रा’, डॉ.राखी कोर्राम, गणेश महंत ‘नवलपुरिहा’, कमल जांगड़े, मनोज जायसवाल, राजेन्द्र कश्यप, डॉ. श्यामा कुर्रे, कु. रेश्मी कोर्राम, श्रीमती सुरजा खाण्डे ‘तनया’, श्रीमती गायत्री दिवाकर,दिलीप कुमार खोटे, चतुर सिंह ‘चंचल’, श्रीमती सरस्वती लहरे, डॉ.गुलाबचंद ‘कुसुम’, श्रीमती श्वेता मनहर, कार्तिक पुराण घृतलहरे, दीनदयाल टण्डन तथा जुगेश बंजारे ‘धीरज’ शामिल हैं।
साहित्य की धरती से राष्ट्रीय क्षितिज तक
छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में लोकभाषा, लोक संस्कृति, प्रकृति, श्रम, संघर्ष, मानवीय रिश्ते और सामाजिक चेतना के स्वर सदैव प्रमुख रहे हैं। नई पीढ़ी के रचनाकार इन परंपरागत संवेदनाओं को आधुनिक दृष्टि और नवीन अभिव्यक्ति के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ‘धरोहर’ जैसे साझा संकलन साहित्यकारों के बीच संवाद का सेतु बनने के साथ-साथ विविध रचनात्मक स्वरों को एक ही मंच पर स्थान देने का कार्य करते हैं।
56 कलमों का यह साझा पड़ाव वास्तव में 56 अलग - अलग संवेदनाओं, अनुभवों और अभिव्यक्तियों का संगम है। इन रचनाकारों की लेखनी जब एक ही संकलन में साथ आती है तो वह केवल शब्दों का संकलन नहीं रह जाती, बल्कि अपने समय, समाज और संस्कृति की सामूहिक स्मृति का दस्तावेज बन जाती है।
छत्तीसगढ़ के इन कलमकारों की सहभागिता ने ‘धरोहर’ को स्थानीय संवेदनाओं से राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य तक पहुंचने वाली एक रचनात्मक कड़ी का स्वरूप दिया है। यह उपलब्धि प्रदेश के साहित्य जगत के लिए उत्साहवर्धक है और उन तमाम कलमकारों के लिए प्रेरणा भी, जो अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में संवेदना, विचार और जागरूकता की लौ प्रज्वलित कर रहे हैं। क्योंकि कलम की स्याही सूख सकती है, लेकिन सच्चे शब्दों से रची गई धरोहर समय के साथ और गहरी होती जाती है।