दादा मुन्ना दास जी को आज उनके 34 वें स्मृति दिवस पर शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजली।

दादा मुन्ना दास जी को आज उनके 34 वें स्मृति दिवस पर शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजली। 
प्रेस छत्तीसगढ़ महिमा रायगढ़। 18 अक्टूबर 2021,
       18 अक्टूबर स्मृति दिवस विशेष - 
सामाजिक समरसता के संवाहक युवाओं के प्ररेणा स्त्रोत दादा मुन्ना दास ,समाज में फैली कुरितीयों को लेकर रचनाकार उस अंतिम ब्यक्ति के साथ होता है जहाॅ पर किसी का वश नहीं चलता और उस लडाई में लेखनी से संवेदनशीलता दिखाने के साथ - साथ खडा भी रहता है। अपने अंतस से समाज में परिवर्तन लाने को आतुर रहता है जितना भी गुंजाईस हो हर शक्ल में उपस्थिति देने का प्रयास करता है ,ठीक उसी प्रकार समाज में सामाजिक समरसता ,कुरितीयों ,विषमता की चरम सीमा को विभेदन करने इस भारत वर्ष में ज्ञानी,संत,महापुरूष जन्में और समाज को राह दिखाने का प्रयास किये समाज में परिवर्तन लाये लोगों को जागरूक किये जिन्हे इतिहास में जगह मिली और उन्हे याद करके आज भी समाज अपने आपको धन्य और गौरववांनित मानता है । 
आज भी समाज अलग - अलग पंथ ,जाति ,धर्म ,समुदाय में बंटे हैं फिर भी एक दूसरे पंथ ,धर्म ,समुदाय का आदर और सम्मान करतें हैं। समाज में एकता हैं। जाति ,धर्म ,पंथ, समुदाय अनेक होने के बाद भी इंसान सभी वर्ग के संत ,ज्ञानी, महापुरूषों का सम्मान और आदर करते हैं संत बाबा गुरूघासीदास जी, संत कबीर जी पुजे जाते हैं उनकी सामाजिक समरसता का गुणगान होता है जो किसी से छुपा नहीं है जिन्होने समाज को दिशा दी लोगों को जागरूक किये और समाज के प्रेरणा बने । 
सामाजिक समरसता के संवाहक युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत दादा मुन्ना दास से रूबरू करना चाहूॅगा जो इतिहास के पन्ने में कहीं गुम हो गई जो अपने नई पिढी के लिए आगे आकर समाज के लिए जो योगदान दिये वास्तव में सराहनीय था। दादा मुन्ना दास लहरे का जन्म छत्तीसगढ के रायगढ जिले के कोसीर गांव के किसान परिवार में पंचम दास के घर सन 25 फरवरी 1926 को हुआ था । पंचम दास गांव के सभ्रांत किसान थे पढे लिखे कम थे । संत बाबा गुरूघासी दास जी के अनुयायी थे । उनके संदेशों - उपदेशों का उनके परिवार में असर था और बाबा के उपासक थे। मुन्ना दास जी का बाल्यकाल कुछ खास नही रहा अपने पिता के एकलौते पुत्र थे सन 1933 में जब वे सात वर्ष के हुए तब उनकी  दाखिला गांव के ही बालक स्कूल में करायी गई बालक स्कूल का स्थापना सन 1908 में हुआ था। कोसीर गांव में पढने दुर दराज के गांव के भी लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे । आजादी के पहले गांव देहात में रहने वाले कम परिवार के ही लोग स्कूल में दाखिला लेते थे और दाखिला हो भी जाती थी तो शिक्षा नहीें ले पाते थे ,वैसाा ही हाल दादा मुन्ना दास का था दाखिला तो हुए पर स्कूल पढने बहुत कम जाते थे। लगातार अनुपस्थिती के कारण दाखिल खारिज से नाम हटा दिया गया और स्कूल जाना बंद कर दिये और नहीं पढ पाये और खेती किसानी के काम में पिता का साथ देने लगे ,बाल्यकाल में ही विवाह का प्रचलन था और ओ भी विवाह के बंधन में बंध गए। जैसे तैसे होस संभाले थे तब ओ लगभग 19 वर्ष रहा होगा। पत्नी की तबियत खराब रहती थी एक दिन तबियत बहुत बिगड गई और गुजर गई उनके दो पुत्र थे अभी चलना ही सिखे थे बच्चो की देख भाल करने में परेशानियों का सामना करना पढ रहा था तब उनका विवाह बलौदाबाजर ;वर्तमान जिला के टीहलीपाली के गौटिया परिवार के बेटी श्रीमती रामबाई जी से हुई उनकी पहले पत्नी के दो पुत्र थे ओ भी बडे होने लगे और श्रीमती रामबाई ने भी एक पुत्री को जन्म दिया देखते ही देखते परिवार बढ गया और राम बाई जी के दो पुत्र तीन पुत्री हुई रामबाई काम काजी महिला थी। दादा मुन्ना दास के चार पुत्र और तीन पुत्री में दो पुत्र समय के पहले ही चल बसे। परिवारीक जीवन उथल पुथल भरा रहा । कोसीर गांव में आजादी के बाद कक्षा 6 वीं तक की पढाई होती थी उस समय मिडिल स्कूल में हिन्दी की पढाई होती थी अंग्रेजी की पढाई नही होती थी । 15 अगस्त 1947 के लगभग एक दशक के बाद सन 1956 में 15 अगस्त को स्कुली बच्चे प्रभात फेरी में नारा लगा रहे थे अंग्रेजी पढाओ बालक बचाओ । गांव के शिक्षक रहे वरिष्ठ साहित्यकार तीरथ राम चन्द्रा जी बताते हैं तब नारा को सुनकर दादा मुन्ना दास गांव के चौक में रूके और नारा की जानकारी लिये वो उस समय खेत से हल लेकर घर को लौट रहे थे वह चौक  जो अभी वर्तमान में डा अम्बेडकर चौक  के नाम से जाना जाता है। बचपन में न पढ पाने की दुख ने उनके मन में संवेदना भर दी और स्कूल में अंग्रेजी पढाने के लिए शाला विकास समिति में उस समय के तत्कालीक प्रधानाध्यापक चन्दन राम यादव को अपने जमीन बेजकर 10 हजार रूपये दिये तब स्कूल में अंग्रेजी की पढाई शुरू हुई उस समय का 10 हजार आज 10 लाख से भी ज्यादा है। उनकी उस समय की स्वेच्छा से दान युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई उन्हे नही पढ पाने का दुख था जो अपनी 31 वर्ष की आयु में कोसीर के जिए कुछ किया और उनकी इस सराहनीय योगदान का पुरे अंचल में प्रसंसा हुई 
जो काम गांव के धनाढय परिवार के लोगों की बस की बात नही थी उस काम को एक साधारण ब्यक्तिव के किसान के बेटे ने किया। यही नही सत्र 1966 के आस पास पुरे अंचल में सुखा के चपेट में आ गया तब लोगो को भुखे मरने की नौबत आयी तक एक बार फिर  समाज के लिए आगे आये और अपने घर में रखे धान को लोगों को दिये बाद में जो लोग लिए थे उपज होने पर दूसरे पवर्ष वापस कर दिये। इस तरह समाज के प्रति हमेशा सजग रहे। सत्र 1983 में उनकी तबीयत ठीक नही रहा और तबियत बिगडने से 18 अक्टूबर सन 1987 को उनकी निधन हो गई लगभग 62 वर्ष के थे। दुसरे दिन पुरे गांव में शोक की लहर दौड गई लोगों को बहुत दुख हुआ।
गांव के सभी स्कूलों में दुसरे दिन शोक ब्यक्त किया गया और श्रृद्धांजलि देकर छुट्टी कर दी गई। दादा मुन्ना दास के निधन के बाद पुरे परिवार की जिम्मेदारी उनके बडे पुत्र त्रिलोचन जी ने संभाली। आज उनकी योगदान को गांव में बुढे लोग कहते नही थकते हैं ऐसे सामाजिक समरसता के संवाहक युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत की पुनः जरूरत है। उनकी जीवनी और सामाजिक योगदान पर वर्णन कर पाना मेरे बस की बात नही है फिर भी एक कोशिश है जो मैं उनकी इतिहास को अपने शब्दों में ढालकर बताने की कोशिश कर रहा  हूँ जो आज भी प्रासंगगीक है। आज उनकी  34 वां 18 अक्टूबर स्मृति दिवस पर मैं श्रृद्धा सुमन अर्पित करता हूॅ जो कोसीर गांव का गौरव और अंचल के युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत रहे। लक्ष्मी नारायण लहरे सह संपादक प्रेस छत्तीसगढ़ महिमा